ये घोंसला तो बन गया कूड़ेदान | राय
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ये घोंसला तो बन गया कूड़ेदान |  राय

 

ये घोंसला तो बन गया कूड़ेदान | राय

Published on :13 Oct,2017 By :- UNT News Desk



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:हर महीने चावल का थैला आया, पालीथिन में सामान आया तह लगाई संभाल दिए। गत्ते पर पैक इलेक्ट्रानिक आइटम आया तो गत्ता दुछत्ती में डाल दिया। कपड़े जब बेकार हुए तो दीवान में छिपा दिए। हर बेकार चीज के गुण गिने और घर को पूरा पैक किया।
....पंछी कूड़े से खूबसूरत घोंसला बनाते हैं और आदमी घर को कूड़ा बनाने पर तुले रहते हैं। त्योहारों के मौकों पर तो सामान खरीदने का भूत ही सवार हो जाता है। घर में चाहे कितने ही बर्तन हों पर धनतेरस पर हर घर में दो-चार बर्तन जरूर आते हैं। कितनी ही तंगी हो ईद पर कुछ न कुछ जरूर खरीदा जाता है। घर अपना हो या किराए का, बाजार में खरीदने को कोई किसी से कम नहीं होता।
....ठसा-ठस भरे कमरों में दम घुटा जाता है, लेकिन चाहत पूरी नहीं होती। कुछ घरों में तो सोफे केवल धूल के बैठने के काम आते हैं, पर लगता है कि एक सोफा और होता तो बात ही क्या थी। पर्व आते ही घर की हर चीज पुरानी सी लगती है और उसे बदलने के लिए दिल हिलोरे मारता है।
....मध्यम दर्जे के परिवारों में ये पागलपन सबसे ज्यादा सवार रहता है। ऊपर वालों की बराबरी और नीचे वालों को छोटा दिखाने की सनक घर को नरक बनाती चली जाती है। लगता है कपड़ों से तो घर शोरूम ही बन जाएगा, इच्छा पूरी तब भी नहीं होती।
....अखबार आते ही लोग पहले उसे झाड़ कर दुकानों के आफर वाले कागज पढ़ते हैं। कुछ पुरुष तो मन की बात किन्हीं कारणों से दबा लेते हैं पर महिलाओं की रुचि सामने आ जाती है। व्यापारी झांसा देकर ठगते हैं और लोग प्रसन्नचित दिखते हैं।
...संपत्ति का मोह इस कदर हावी है कि लोग भोजन, मनोरंजन, पढ़ाई समेत मानव जीवन की हर जरूरत को छोड़ सामान एकत्र करने में जुटे रहते हैं। घरों में अधिकतर सामान गैर जरूरी होता है, लेकिन भूख मिटती नहीं।
...ये मोह कोई प्राकृतिक नहीं है। बाजार इसे पैदा करता है और संपत्ति की भूख बढ़ाई जाती है, आवश्यकताएं पैदा की जाती हैं। इसके बाद हर व्यक्ति को खुलेआम लूटा जाता है। इस लूट को जायज बताने के लिए पूरा सरकारी तंत्र जुटा रहता है, लुटेरों की सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए जाते हैं।

--बाजार के हवाले असुरक्षित जिंदगी.... ( चंद्रशेखर जोशी)





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