बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के मायने क्या? | राय
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बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के मायने क्या? | राय

 

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के मायने क्या? | राय

Published on :25 Sep,2017 By :- UNT News Desk



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नई दिल्ली:सरकार का लक्ष्य एक ख़ास किस्म की बेटियों को बचाना और पढ़ाना है। ऐसी बेटियां जो संस्कारी हों, गुणवान हो, पाक कला में निपुण हों, ज्यादा डिमांड्स ना करती हो, पितृसत्ता के सांचे में पूरी तरह से फिट बैठती हो और जो अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को ना तलाशती हो। सरकार ऐसी ही बेटियों को बचाना चाहती है और उन्हें थोड़ा बहुत पढ़ाना भी चाहती है ।
लेकिन ऐसी लड़कियां जो अपना हक़ मांगे, सुरक्षा मांगे, छेड़छाड़ और लैंगिक भेदभाव की मुख़ालफ़त करे, पितृसत्ता और मर्दवादी मूल्यों को चुनौती दे और अपने वज़ूद की उपस्थिति दर्ज़ कराये ... ऐसी बेटियां नहीं चाहिए। ऐसी बेटियां चाहिए जो मौन रहे लेकिन ऐसी बेटी नहीं चाहिए जो हल्ला बोल कहे । सरकार ऐसी बेटियों को लाठी और आंसू गैस के गोले देती है। सरकार की पुलिस ऐसी लड़कियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटती है।
दुष्ट मनु ने मनुस्मृति में लिखा है - यत्र नारी पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता । लेकिन उसने अगले ही पेज पर लिखा है कि महिला एक खुले पशु की तरह होती है। उसने लिखा है जिस तरह खुला पशु इधर उधर मुंह मारता है उसी प्रकार मर्द के साये (पिता, भाई, पति और पुत्र) के ना होने से महिला भी आवारा हो जाती है इसलिये हमेशा उसे पुरुष के अधीन रहना चाहिए ।। हमारी सरकार भी यही मानती है । इस बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ नारे को नाली में फेंक देना चाहिये । हमें किसी बेटी को नहीं बल्कि एक आज़ाद ख्याल और आज़ाद वजूद वाली लड़की को तैयार होने देना चाहिए ... फिर वो खुद को बचा भी लेगी और खुद को पढ़ा भी लेगी ।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक Sumit Chauhan के निजी विचार हैं.



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